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मैं गुड़िया हूँ, मेरा यही नाम है और यही मेरी पहचान भी। आमतौर से मेरा साबका बच्चों से ही रहा है खास कर बच्चियों से,मुझे बनाने वाले भी अक्सर यही सोच कर हमें बनाते हैं । क्यूंकि अभी तक तो बच्चें ही हमसे घर-घर खेलते आएं हैं, हमें सजाते, दूल्हा-दुल्हन बनाते, मोतियों के जेवर पहनाते, बिंदी लगाते, चूड़ी पहनाते, हमारी शादी करते और खुश होते। उनकी खुशी को देख हम भी खुश होते। कभी कभी हमें घर के किसी कोने को सजाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता । लेकिन एक रोज़ कुछ अलग हुआ, इस बार मुझे बनाने वाली एक लाइब्रेरियन थी । किताबों से भरे कमरे के बीच बैठकर वह मुझे बना रही थी। मुझे बनाने के लिए वह कुछ नए और रंग बिरंगे कपड़े लायी थी । मुझे बनाकर उसके काम का अंत नहीं हुआ, उसने मेरे जैसी ही एक और गुडिया बनायीं, फिर एक और, फिर एक और । जब वो हमें बना रही थी तो हमें लगा कि, ज़रूर किसी बच्चें के हाथों में देने के लिए ही बनाया है। पर, जब लाइब्रेरियन से पता चला कि हमें लाइब्रेरी एडूकेटर्स कोर्स के दौरान होने वाले एक डिस्प्ले में काम करने के लिए बनाया है,उस वक़्त हमारे मन में एक साथ कई सवाल उठ रहे थे कि, ये लाइब्रेरी डिस्प्ले क्या है, हमें करना क्या होगा, क्या इस बार हमसे खेला नहीं जायेगा ? ये सब हमारी तयशुदा भूमिकाओं से काफी अलग था।

हमसे रहा नहीं गया, अंततः हमने लाइब्रेरियन से पूछ ही लिया कि “हमें करना क्या है ?” लाइब्रेरियन ने थोडा धैर्य रखने को कहा, पर हममें धैर्य कहाँ था । लाइब्रेरियन ने सामान और किताबों की पैकिंग की, हमें साथ लिया और भोपाल शहर के लिए रेल में बैठ गई । खैर, वो दिन आ ही गया और हम सब एक डिस्प्ले का हिस्सा बने और उसका थीम था “लाइब्रेरी बुक”।

एक बड़े से हॉल में बहुत सारी किताबे प्रदर्शित की गई थीं,और उस डिस्प्ले में हमारी भूमिका किताबों की इस दुनिया को जानने और समझने के लिए आने वालों का स्वागत करने की थी। एक बड़े काग़ज पर लिखा था “लाइब्रेरी में आपका स्वागत है” और हम पाँचों ने उस कागज को चारों तरफ से पकड़ रखा था। हमारे इर्द-गिर्द किताबें रखी थीं और उन किताबों के साथ कई सारी चीजें भी रखीं थीं जैसे– कुछ जानवर,आइना,फोटो फ्रेम,चप्पल और भी बहुत कुछ। वह माहौल लोगों को किताबें उठाने और पढने के लिए अपनी ओर खींच रहा था ।

प्रतिभागी किताबों को देखने आते और हमें भी देखते, और कहते-“ये गुड़ियां यहाँ क्या कर रहीं हैं ? शायद ये हमें किताबों को देखने के लिए इशारा कर रही हैं ।“
“हमने ऐसा कब कहा और इन्होंने कैसे सुन लिया?” स्वागत वाले पेपर को हाथ में लिए लिए ही हमने सोचा। धीरे-धीरे हमें समझ में आया, यह डिस्प्ले का कमाल है । बहुत सी ऐसी बातें जो सीधे-सीधे नहीं कही जातीं, देखने भर से ही लोगों को समझ में आ जाती हैं । हमें समझ में आया कि डिस्प्ले बिना बोले लोगों से संवाद करने की कला है। कोर्स में अलग अलग राज्यों से आये हुए लोगों से मिल कर अच्छा लग रहा था। कहाँ किताबें और कहाँ हम – बिलकुल ही अनोखा मेल था। हम इस तरह का काम भी कर सकते हैं यह सोचा न था, लाइब्रेरी के लिए काम करने का यह एक अलग ही अनुभव था ।

कुछ दिनों के बाद पता चला कि हमें मुंबई जाना है, यह सुनते ही हम खुशी से झूम उठे और इसके साथ ही हमारे मन में कई सारे सवाल भी उठ रहे थे । फिर हमें लाइब्रेरियन ने बताया कि वहां होने वाले एक लाइब्रेरी वर्कशॉप में भाग लेना है और “विविधता” हमारे डिस्प्ले का थीम है । हमें अलग अलग तरह की किताबों के विविध किरदारों में ढलना था, किताबों के भीतर कैसे-कैसे विषय मौजूद हैं, यह दिखाने के लिए हमें उन किरदारों के रूप में किताबों से बाहर आना था । ताकि पाठक जान पायें कि किताबों से निकले ये किरदार कौन हैं? हमारा विश्वास था कि हमें देखने और जानने के बाद लोग हमारे साथी किरदारों को खोजने के लिए उन किताबों को खोलेंगे और पढेंगे । हमें हमारी भूमिका के अनुसार तैयार किया गया, बड़ा ही मज़ा आ रहा था जैसे हम किसी बड़े उत्सव के लिए तैयार हो रहें हो। मेरी भूमिका थी मालथी की, जो कि “उड़ चली” किताब की मुख्य पात्र है। मेरे लिए लाइब्रेरियन ने एक छोटा सा गते का व्हीलचेयर बनाया था और दो पहिये अलग से बनाए थे जिसको मैंने अपने हाथों में उठाया, बिलकुल वैसे ही जैसे उड़ चली किताब के मुख्य पृष्ट पर चित्र बना है। ये पहली बार था कि मैं व्हीलचेयर पर बैठने वाली गुड़िया बनी थी और अपने हाथों में पहिये को उठा कर ऐसा महसूस कर रही थी कि वो पहिये नहीं मेरे पंख हों और अभी के अभी असमान में उड़ जाउं। मालथी होला को भी कुछ ऐसा ही लगता होगा कि उनका व्हीलचेयर उनके पंख है तभी तो वो अंतररास्ट्रीय एथेलीट बन पाई। सच में ऐसा मजेदार अनुभव कभी नहीं हुआ।

मेरी साथी गुड़िया “क्यों क्यों लड़की” किताब की मोयना बनी थीं, वो भी बिलकुल मोयेना की तरह तैयार हुई- वैसे ही सफ़ेद और लाल बॉर्डर वाले कपड़े पहने और मोयना के जैसे ही अपने बालों में फूल भी लगाया था। जब लाइब्रेरियन उसे डिस्प्ले के लिए तैयार कर रही थी तब वो मोयना की तरह ही क्यूँ-क्यूँ करके खूब सवाल पूछ रही थी । उसको देख ऐसा लग रहा था मानो सच में मोयेना ही किताब से बाहर आ गई हो और सवाल पूछे जा रही हो ।

हमारा दूसरा साथी “मुकुंद और रियाज़” किताब के पात्र रियाज़ की भूमिका निभा रहा था। लाइब्रेरियन ने उसे भी बिलकुल रियाज़ की तरह ही वेश भूषा पहनाया और साथ में जिन्ना टोपी भी। उसे रियाज़ बना देख अच्छा लग रहा था और वो भी खुश हो रहा था क्यूंकि उसने भी इस तरह का पहनावा कभी नहीं पहना था। मैं जब भी भारत के विभाजन के बारे में सोचती हिंसा की एक भयावह तस्वीर सामने आती थी । कभी सोचा ना था कि हिंसा, मार पीट, खून खराबा से परे दोस्ती की ऐसी मिशालें भी थीं जिसे लोग अपनी जान पर खेल कर निभा रहे थे । हमारा यह साथी भी विविधता के उस डिस्प्ले में लोगों को द्वन्द के अनुभव पर आधारित यह किताब पढने का निमंत्रण दे रहा था ।

हमारी एक और साथी “पायल खो गई” की मुख्य पात्र ‘पायल’ की भूमिका निभा रही थी। उसके लिए लाइब्रेरियन ने कागज के गते से, सर्कस का एक ढांचा तैयार किया था, और ठीक वैसा ही ढांचा बनाया जैसे सर्कस में काम करने वाले बच्चे रस्सी पर चलते हैं। पायल खो गई किताब का नाम सुन कर हमारे मन में भी कुछ सवाल बार बार आ रहे था कहाँ खो गई थी पायल? कहाँ चली गई थी? कैसे मिली ?

जीवन में पहली बार इतना सब कुछ हो रहा था, हम सब उत्साहित थे अपने-अपने किरदार को लेकर और शायद हम इस किरदार से बाहर निकलना भी नहीं चाहते थे । उस वर्कशॉप में मुंबई के अलग-अलग स्कूल में काम करने वाले शिक्षक आए थे । इतने सारे शिक्षकों से मिलने का यह पहला मौका था। वो भी हमसे मिलने डिस्प्ले के पास आ रहे थे । आपस में बातें करते और कहते “अरे .. ये तो मोयना है….. कोई कहता, अरे ये तो उड़ चली किताब की मालथी है, ….. तब हमारा भी मन करता की चिल्ला कर कहें हाँ हाँ बिलकुल ठीक पहचाना…”

कुछ समय बाद लाइब्रेरियन ने बताया कि हमें एक और किताबों के डिस्प्ले में भाग लेना है, और ज़ल्द ही हम देश की राजधानी में हो रहे एक कोंफ्रेंस में लाइब्रेरियन के साथ चल पड़े । डिस्प्ले का थीम था “ जेंडर”। वहां जेंडर के विषय पर अलग-अलग तरह की किताबें डिस्प्ले की गईं थी। प्रदर्शित किये गए किताबों में से एक किताब थी “द पेपर बैग प्रिंसेस” उस किताब के मुख्य पात्र प्रिंसेस की भूमिका मैं निभा रही थी और मैंने भी पेपर के कपड़े पहने थे। पेपर के बने कपड़े को पहनना एक अलग तरह की अनुभूति दे रहा था। थोड़ा अजीब था, पर मजेदार भी और मजेदार हो भी क्यूँ ना आखिर मैं ड्रैगन को हरा देने वाली प्रिंसेस जो बनी थी । मेरी दूसरी साथी को लाइब्रेरियन ने “द अनबॉय बॉय” किताब के मुख्य पात्र गगन की भूमिका दी थी। उसके हाथ में भी एक छोटा सा टेडी बेयर था जैसा कि गगन के हाथ में हुआ करता है। हम एक बार फिर से इतने सारे लोगों को एक साथ देख रही थे, मैं थोड़ी घबराई हुई थी पर डिस्प्ले के लिए उत्सुक भी। जब प्रतिभागी हमें देख रहे थे तो मैं सोच रही थी कि जेंडर के जिस सवाल को हमने अपने शरीर पर ओढ़ रखा है उसको समझने के लिए ये कौन से किताब चुनेंगे।

ये सिलसिला चलता रहा, हम अपनी लाइब्रेरियन के साथ अलग अलग जगहों पर लाइब्रेरी का काम करते रहे। लाइब्रेरी एडूकेटर्स कोर्स का एक और नया बैच जल्द ही शुरू होने वाला था । हम नए बैच से मिलने के लिए बहुत ही उत्सुक थे। समय कैसे बीता, पाता ही नहीं चला। इस बार भी अलग अलग राज्यों से प्रतिभागी आए थे । कांटेक्ट पीरियड में इस बार भी डिस्प्ले लगाने की योजना थी, और इस बार फिर से डिस्प्ले का थीम था “लाइब्रेरी बुक”, और मेरी भूमिका अलिया की थी, जो “बसरा की लाइब्रेरियन” किताब की पात्र है। अलिया बनने के लिए मैंने बिलकुल ही अलग वेश -भूषा धारण किया, जो मैंने कभी नहीं पहना और न कभी पहने का विचार मेरे मन में आया, वो था हिज़ाब । हिजाब वाली गुडिया तो बाज़ार में भी नहीं मिलती तो विचार भी कैसे आता । अलिया बनना मेरे लिए बहूत ही गर्व की बात थी। क्यूंकि करीबन सौ साल पहले विश्व युद्ध के दौरान, अपने जान पर खेल कर, उन्होंने अपनी लाइब्रेरी की करीबन तीस हज़ार किताबों की रक्षा की थी। मेरी एक और साथी “मिस मूर थॉट अदरवाइज” किताब की पात्र मिस मूर बनी थी । उसने भी मिस मूर की तरह कपड़े पहने। वो भी उतनी ही गौरान्वित हो रही थी जितनी की मैं, क्यूंकि मिस मूर ने बहुत साल पहले एक ऐसे बेहतरीन लाइब्रेरी का निर्माण किया और चलाया, जिसकी कल्पना अब जाकर हम कर पाते हैं, जहाँ बच्चें किताबों की तरफ देखते भी नहीं थे, वहां वे कताबें खोज खोज कर पढ़ते हैं ।

अपने आप को आम से खास बनता देखना मेरी कल्पना के परे था । अपने वजूद के होने का एह्साह हो रहा था । ऐसा लग रहा था मैं एक बहुत जरुरी काम कर रही हूँ , डिस्प्ले का काम , हर कोई जो हमें देखता हमसे कुछ जानने की कोशिश करता था, हमें ऐसा लग रहा था कि हम एक ऐसी खिड़की हैं जिनसे झांक कर लोग किताबों के बारे में जानते हैं । अब इंतजार है अगले कांटेक्ट पीरियड का जो की नवम्बर में है ।

पत्र संवाद

Vidya Kakade, Library Educator in Kamala Nimbkar Bal Bhavan School encouraged grade 6 students communicate with their favourite author through letter writing.

Niju Mohan Library Educator's Course 7 Sep 2014

The Leading Reading Schools of India Awards 2015

The Leading Reading Schools of India Award is an annual award established by Young India Books – India’s foremost review site of children’s books; to recognize and honour the five leading schools of the country; schools that believe in the power of the written word and inculcate a love for books and reading.

Niju Mohan Library Educator's Course 13 Aug 2014