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उदारीकरण के बाद हमारे देश की सामाजिक संरचना के ढाँचे में परिवर्तन आया है। उसकी प्रतिष्ठा सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय से अनुमानित की जाती है। इसने कला-संस्कृति को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। हमारे गाँवों में लोग धान के बीज को बड़े सुरक्षित तरीके से अगली फ़सलों के लिए बचाकर रखते थे। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा था। विगत दो दशकों में यह सिलसिला लगभग टूट सा गया है। हमने कुछ अतिरिक्त कामों से ख़ुद को आज़ादी दे दी। अब कुछ भी बचा ले जाने (संजो लेने/संरक्षित करने) की कोई चेष्टा नहीं है। बाजार ने हर चीज को हमारे घर तक उपलब्ध करा दिया है… रोटी…कपड़ा…मकान…मनोरंजन। बाजार ने हमें स्वकेंद्रित कर दिया है या हम ख़ुद होना चाहते थे? यह बात समझ में नहीं आती। हमने भरसक इसको पाँव पसारने में सहयोग ही किया। उदारीकरण के बाद शहरों के नवीनीकरण की प्रक्रिया जैसे शुरू की गई थी। शहर के भीतर शहर बसने लगे थे.. आधुनिक सुविधाओं से युक्त बहुमंजिला इमारतें, हाई टेक बाजार…और भी बहुत कुछ। कहने का मतलब जमीनों के दाम बेहिसाब महंगे हुए। रहन-सहन के तरीक़े तेजी से बदले। अब हर कोई व्यवसायी था। सबने कई मकान-प्लाट इसलिए खरीदे ताकि भविष्य में उनसे मुनाफ़ा कमाया जा सके। अपनी निजी सम्पतियाँ इसी सोच की बलि चढ़ीं फिर सार्वजनिक जगहें… हाट, खेल-मैदान, चारागाह, रंगशालाएं, होटल, पार्क, सिंगल स्क्रीन थियेटर और भी बहुत कुछ। धीरे-धीरे सब कुछ जैसे विलुप्त हो रहा है… कस्बों, शहरों और नगरों से। इस बात को लेकर हम भी अभ्यस्त होते जा रहे हैं। अब कुछ भी बचाने या फिर नई पीढ़ी को हस्तांतरित करने की कोई भावना नहीं। सबकुछ रेडीमेड व्यवस्था पर जैसे आश्रित होता जा रहा है। सामूहिकता जैसे शब्दकोष का एक विस्मृत शब्द बनकर रह गया है। उसी खोते हुए को बचा लेने की कहानी कहता है “नाचघर”।

‘नाचघर’ प्रियम्वद का पहला बाल उपन्यास है। यह उपन्यास पंद्रह अध्यायों में बाईस वर्षों के कथानक को समेटे हुए है। इसमें अतनु राय के चौदह ख़ूबसूरत इलस्ट्रेशन भी हैं, जो नब्बे के दशक की कहानी कहते उपन्यास को अनूठे कलेवर में प्रस्तुत करते हैं।

वर्तमान में लिखे जा रहे बाल साहित्य में तो गुजरे वक्त की मीठी यादों ही तो संजोयी गई हैं। बचपन के संघर्षों, भय, चिंताएं,अनुत्तरित सवालों और चुनौतियों की जगह सीमित है। जबकि वास्तव में यही हमारी और आने वाली पीढ़ी के लिए थाती हैं। ‘प्रियम्वद का नाचघर’ मीठी यादों को संजोने के साथ-साथ टीस की भी कहानी कहता है।

कानपुर शहर के पृष्ठभूमि में ‘नाचघर’ कहानी है दो किशोरों की- मोहसिन और दूर्वा। जो अपने परिवेश से बाहर कुछ तलाश रहे होते हैं। नाचघर उनका ठिकाना बनता है। जहाँ वे बाहर की दुनिया से संपृक्त हो अपने ख्यालों के पंख लगाकर उड़ने की कोशिश करते हैं। दोनों का किशोर वय निश्छल प्रेम है। उससे उपजा विस्मय और रोमांच भी। जो कहानी के साथ विविधरंगी होता जाता है। सधी-सरल भाषा में छोटे-छोटे वाक्य बतियाते से लगते हैं। मानों कोई सामने बैठा नाचघर की आँखों देखी कहानी सुना रहा हो। पात्र आपस में संवाद करते-करते सहसा पाठक से भी बातें करने लगते हैं। बातें भी वैसी कि बहुत सी व्यवहारिक-मानसिक-सामाजिक गिरहें खुल जाएँ।

अन्य प्रमुख पात्रों में एक तरफ़ सगीर और उसकी लिल्ली घोड़ी हैं। सगीर एक तरफ़ वैद्यजी की रामलीला सीता की सहेली बनता है तो दूसरी ओर बारात में लिल्ली घोड़ी के साथ नाचते हुए ‘तू प्रेम नगर का राजा…जैसे गीत गाता है। वर्तमान में नाच के अप्रासंगिक होते जाने को लेकर मायूस है। एक कलाकार जो डूबती हसरतों के साथ दरगाह के समीप की दुकान पर चादर बेचता है।

दूसरी ओर पादरी हेबर, मेडलीन की वसीयत और शहर का बड़ा बिल्डर काला बच्चा हैं। जिनके हाथों में नाचघर के भविष्य का फ़ैसला था। यानि शहर की सांस्कृतिक विरासत के बिकने के पीछे जिम्मेदार लोग। इसके साथ-साथ अन्य छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण पात्र इस उपन्यास में रोचकता के साथ बुने गए हैं। जो पाठकों को कहानी की लय में शामिल कर लेते हैं। इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है – “नाचघर”।

उपन्यास में लिल्ली घोड़ी की उदासी, पियानो और बालों की लट,एक रुकी हुई सुबह, द लास्ट ग्लिम्पस, सोन ख़्वाब, केशों में केसर वन आदि जैसे अलग-अलग उप-शीर्षक हैं। इन्हीं शीर्षकों के साथ यह उपन्यास चकमक पत्रिका में धारावाहिक के रूप में छपा भी था।

इस उपन्यास में कई रेखाचित्र लेखक ने खींचे हैं। इन रेखाचित्रों से उपन्यास में सामान्य से सामान्य पात्र भी उभर आता है। जो या तो घटना विशेष को मुकम्मल करता है या फिर उनको विस्तार दे देता है। जैसे ‘लिल्ली घोड़ी की उदासी’ का सगीर, ‘कन्फेशन बॉक्स’ में लड़की मेडलिन, ‘एक रुकी हुई सुबह’ में पचसुतिया पेड़ के नीचे बैठा हुआ आदमी, ‘लालमिर्च’ का काला बच्चा और नुजुमी आदि।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 (NCF 2005) इतिहास शिक्षण के बारे में यह कहता है – “इतिहास को इस तरह से पढ़ाया जाना चाहिए कि उसके माध्यम से विद्यार्थियों में अपने विश्व की बेहतर समझ विकसित हो और वे अपनी उस पहचान को भी समझ सकें। जो समृद्ध तथा विविध अतीत का हिस्सा रही है। ऐसे प्रयास होने चाहिए कि इतिहास के विद्यार्थियों को विश्व में होते रहे बदलाओं व निरंतरता की प्रक्रियाओं की खोज में सक्षम बना पाए और वे यह तुलना भी कर सकें कि सत्ता और नियंत्रण के तरीक़े क्या थे और आज क्या है?”

नाचघर में जीवंत शहर है। लोग हैं, उनके जीवन-यापन हैं। शहर का वर्तमान है। इतिहास भी है। लेखक इतिहास के अध्येता रहे हैं। ‘भारत विभाजन की अन्तः कथा’ इनके प्रसिद्ध किताबों में से है। इस उपन्यास में ऐतिहासिक सन्दर्भ कहानी के साथ इस तरह आते हैं कि इतिहास बोध का कोई अतिरिक्त आग्रह पाठक को नहीं लगता। इतिहास के सन्दर्भों का लेखक ने बहुत ही सुन्दर प्रयोग किया है। जिससे बाल पाठकों की रूचि इस उपन्यास के कथानक में बढ़ जाएगी।

उपन्यास बहुत ही रोचक तरीके से लिखा गया है। इसमें पठनीयता भी बहुत है। इसमें नाचघर एक सपने की तरह आया है, जिसे प्रियम्वद नयी पीढ़ी की आँखों में भरना चाहते हैं – वर्तमान निर्मम समय में लुप्त होती, नष्ट की जा रही शिथिल पड़ती विरासतों, संस्कृतियों और कलाओं को बचा लेना। जैसे मोहसीन और दूर्वा ने नाचघर को बचा लिया और उसकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

अंत में दो तीन बातें जो अगर इस उपन्यास में दुरुस्त कर ली गयी होती तो शायद यह उपन्यास और भी प्रभावी हो जाता। मसलन रानी एलिजाबेथ का एक ही सन्दर्भ दो बार हू-ब-हू प्रयुक्त हुआ है। जिसको पढ़ते हुए पाठक एक दुहराव महसूस करता है। सगीर और उसकी लिल्ली घोड़ी उपन्यास के शुरू में महत्वपूर्ण पात्र के रूप में उभरते हैं। उपन्यास पढ़ते हुए लगता है कि इन चरित्रों का विस्तार जरूरी था। साथ ही ‘हम होंगे कामयाब’ और ‘ऊपर चले रेल का पहिया, नीचे बहती गंगा मैया’ को पढ़ते हुए कहानी ठहर सी गई लगती है।

हाल-फ़िलहाल में ऐसे बाल उपन्यास हिंदी में नहीं आए हैं। प्रियम्वद का “नाचघर” बाल साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में याद किया जाएगा। इसके लिए लेखक और उनके प्रकाशक ‘इकतारा, भोपाल’ का साधुवाद।

डर साझा किए जाने वाली बात है

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