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Author (Hindi)
Shortlist 2019
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“अवार्ड एक मोका पैदा करते हैं। विमर्श का। सोचने समझने का। और किसी काम को सेलिब्रेट करने का।”

बच्चों के लिए लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? 

लिखकर अच्छा लगता है। लिखने में होने का आनंद सबसे अधिक खींचता है। तो सबसे पहले जैसे अपने ही लिए लिखता हूँ। वैसे ही जैसे मैं कुछ बोलता हूँ तो खुद सुनता भी हूँ। कान बंद करके भी बोलूँ तो खुद को सुनाई देता है। जैसे, किसी से मिलूँगा तो अपने लिए भी मिलूँगा। खुद को अनुपस्थित करके किसी से नहीं मिल सकता। यही मिलावट लिखने में रहती है। लिखकर किसी से मिलने की कोशिश करता हूँ। कोई भी इंसान अपने बचपन की उमर काटकर अलग नहीं कर सकता। इसलिए जब बच्चों के लिए लिखने का सोचता हूँ तब भी बच्चों के लिए लिखता हूँ और जब बड़ों के लिए लिखना सोचता हूँ तो बड़ों में शामिल बचपन के लिए लिखता हूँ।

जब से आप बच्चों की किताबें पढ़ रहें हैं तब से आपने हिंदी बाल साहित्य की प्रकृति और प्रवृत्ति कोई बदलाव महसूस किया है? 

कई बदलाव आए हैं। कुछ सुखद बदलाव हुए हैं। पंचतंत्र का मुहावरा हाल तक बाल साहित्य पर काबिज रहा – एक बनिया था। एक ब्राम्हण था…। आदि। इसमें जाति सबसे महत्वपूर्ण थी। आज के साहित्य में यह मुहावरा बदला है। भाषा बोलचाल की तरफ आई है। उसमें शुद्धतावादी ठसक कम हुई है। उदारता आई है। विविधता बढ़ी है – कहन की, परिवेश की, इंसानों की, विधाओं की, पेशकश की। हाशिए की कहानियाँ आने से भी भाषा बदली है। मूल्यबोध बदले हैं। साहित्य ज़्यादा समावेशी हुआ है। विषयों ने भी भाषा को खोला है। वह नए-नए दरवाज़े खटखटाती है। अलग-अलग लोगों की जुबान में बात करती है। अनुवाद के माध्यम से काफी सामग्री आई है। पर दो चीज़ें खासतौर पर कमज़ोर हुई हैं। – पहला, क्राफ्ट कमज़ोर हुआ है।( यूँ क्राफ्ट को कंटेंट से अलग करके देखना थोड़ना मुश्किल काम है। समझने के लिए यह वर्गीकरण काम में लाया जा सकता है।) कविता और कहानियाँ विचारों से आक्रांत हैं। उनमें कहानियाँ और कविताएँ गुम हैं। वे बहुत बोलती हैं। रचती कम हैं। दूसरा, प्रोडक्शन तथा साज-सज्जा की तड़क-भड़क में कमज़ोर कंटेंट धड़ल्ले से चल रहा है। पढ़ना सिखाना (रूढ़ समझ में) आदि शैक्षिक उद्देश्य बाल साहित्य को एक सँकरे रास्ते पर ले जाने की कोशिश करते हैं। बच्चों की किताबों का खुला मार्केट पहले ही तरह सिमटा है। पर साथ ही फ्लिपकार्ट, अमेज़न जैसे मंचों से किताबों की खरीद का एक रास्ता बना है। एक छोटा-सा दरीचा ईबुक्स का खुला है। चित्रांकन के प्रति सजगता बढ़ी है।

बच्चों के लेखन के सन्दर्भ में मौलिकता क्या है?

अहसान के तौर पर न लिखना… कि बच्चों का भला होगा। कि आप बच्चों को सिखाना चाहते हैं। कुछ मूल्य इत्यादि देना चाहते हैं।लिखना इसलिए कि आप लिखे बिना रह ही नहीं सकते। चित्रकार किसी पेड़ का एक चित्र बनाता है तो वह हमेशा के लिए एक पेड़ बचाता है। उसकी चिड़ियाँ…उस एक क्षण का फॉसिल बना देता है। उस क्षण से जुड़ी सारी यादें बचाता है। एक डर भी बचाता है कि पेड़ कहीं कागज़ में ही न रह जाएँ। और एक गवाही भी बचाता है कि पेड़ है। था। लेखक भी लिखकर यही सब करता है।

क्या आपकी कोई पुस्तक किसी अन्य भाषा में अनुदित हुई है?

रूम टू रीड ने कुछ किताबें दूसरी भाषाओं में ट्रांसलेट की हैं। महीनों की सीरिज़ का मराठी की पत्रिका अनुभव में 12 कवर स्टोरीज़ साल भर प्रकाशित हुई। इस सीरिज की किताब मराठी में आने वाली है।

आपकी पसंदीदा पुस्तक कौन सी है? कृप्या उस पुस्तक के बारे में संक्षेप में बताएँ l

मैं मानकर चलता हूँ कि आप बाल साहित्य की पसंदीदा किताब के संदर्भ में सवाल कर रहे हैं। पिछले बीस सालों के काम में हज़ारों किताबों से रूबरू हुआ। इसलिए एक चुनना मुश्किल है। ….पर अभी झट से याद करूँ तो मान लीजिए … गाँव का बच्चा। इसलिए कि यह किताब कहानी को बनाए रखकर सामूहिकता का अद्भुत मूल्य जगाती है। एक प्रस्ताव देती है। एक बड़ी किताब इस बात से भी बड़ी बनती है कि वह अपने समय के कितने बड़े सवाल को एड्रेस करती है। चित्रांकन भी सुन्दर है। एलिस इन वंडरलैंड से बेहतरीन किताब और माचिस वाली लड़की से बेहतरीन कहानी और खुमिया से बेहतरीन लघुकथा पूरी दुनिया के साहित्य में कम होंगी।

आपका पसंदीदा लेखक कौन है और क्यों?

बाल साहित्य में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कविता के लिए तथा विनोद कुमार शुक्ल प्रोज़ के लिए। सर्वेश्वर एक साथ भाषा, कहन, छंद, विषय सारे मामलों पर ऊँचाई रचते हैं। इब्नबतूता से अच्छा उदाहरण क्या होगा। मँहगू ने मँहगाई में से लेकर धक्कड़ धाएँ..

विनोद कुमार शुक्ल बाल साहित्य के विश्वस्तरीय लेखक हैं। एकदम मौलिक हैं। किसी बात को पहले वैसा नहीं कहा गया जैसा वे कहते हैं। तिलिस्मी। आपके ठीक पड़ोस की बात वे आपको दिखाते हैं तो लगता है कि पड़ोस किसी दूसरे ग्रह की तरह अजनबी था। उनकी भाषा आपको आदतन अर्थ नहीं लगाने देती। वह पाठक को अर्थ रचने के लिए तैयार करती है। भाषा का व्याकरणी ढाँचा ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ती है। और बताती है कि भाषा पानी की तरह तरल होनी चाहिए। उसे अर्थ की प्यास की तरफ मुड़ना आना चाहिए। उनका ही बाल साहित्य है जिसे बड़ों के साहित्य की कसौटियाँ पर कसा जा सकता है। वरना बाल साहित्य की समीक्षा के लिए बाल कसौटियाँ बनानी पड़ती हैं। आमतौर पर बाल साहित्य में जीवों पर इंसानी मूल्यों को लादा जाता है। वे अनोखे लेखक हैं जो चिड़ियों की सम्भावनाओं से भरा इंसान रचते हैं। बोलू का किरदार पतरंगी चिड़िया से प्रेरित है।

पतरंगी जब बोलती है तो उड़ती है
जब बैठती है तो चुप रहती है
बोलकर और उड़कर दोगुना सुस्ताती है
इसलिए दोगुना आराम करती है – चुप रहकर और बैठकर।

आपके लेखन करियर में अब तक का आपका सबसे अहम अनुभव क्या है? 

पहला अनुभव तो लिखने के दौरान ही होता है। लेखन के भीतर उसकी यात्रा का अनुभव। चकमक में मौसमों की एक श्रृंखला लिखने का अनुभव सबसे यादगार है। बारह माह। हर माह को हर माह अलग लिखना। कोई चीज़ वही नहीं रहती। एक गर्मी की चीटी सर्दी में सर्दी की चीटी बन जाती है। उसकी सिमटी कोशिकाएँ देखना और इस संशय से देखना कि आपकी सर्दी की आँखों की कोशिकाएँ भी तो सिमट गई हैं। …

कहीं जाने के लिए घर से निकलते हैं तो पास की चीज़ें पहले छूटती हैं। दूर की चीज़ें देर से छूटती हैं। दूर की चीज़ें दूर रहकर नहीं छूटतीं। वे पहले पास आती हैं। फिर छूटती हैं। इस छूटने और बने रहने को दर्ज करना सबसे रोमांचक रहा।

कुछ मज़ा चिकनिक चूँ चिकनिक चूँ, बोला भैंस के सिर का जूँ… जैसी लगभग नॉनसेंसिकल चीज़ें लिखने में आया। बच्चों के लिए हर जगह अर्थ पर बहुत ज़ोर रहता है। बड़े बच्चों को बहुत मतलब परस्त बनाते हैं। कविता पढ़ो तो कविता का मतलब, कहानी पढो तो कहानी का मतलब। जैसे मतलब रचना के बाहर स्थित हो। लगा कि अर्थ से खाली कविताएं और साहित्य रचने की कोशिश की जाए…

उलटे बाँस बरेली के…
या
बित्ता थोड़ा बड़ा है
बड़ा दही में पड़ा है…

बच्चों के खेल गीतों को बहुत ईर्ष्या से देखता हूँ – अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो अस्सी नब्बे पूरे सौ.. और अपने आसपास के छोटे बच्चों को याद करता हूँ कि गिनती सुनाते वक्त उन्हें याद रहता है कि पहुँचना कहाँ है। दस तक की गिनती सुनाने को बोलो तो हो सकता है वे पाँच या छह या सात भूल जाएँ…मगर उन्हें याद रहता है कि एक दो तीन …और दस। इस गीत में बच्चों के इस स्वभाव को क्या खूब पकड़ा गया है। या रामनरेश त्रिपाठी की वो कविता – छींक – में नंदू इतना छींका इतना छींका इतना छींका… बच्चे इसी मुहावरे में बात करते हैं। इतना इतना इतना ज़ोर का पानी आया..। खैर।

ऐसे ही एक अनुभव आतंकवादी पर एक कहानी बनने की यात्रा का है। .. एक बार एक आतंकवादी मारा गया था। सब खुश थे। उसके पिता और मां को दिखाया जा रहा था। टेलीविज़न पर। मेरे लिए वह बहुत मार्मिक क्षण था। एक माँ पिता को कैसा लगता होगा जब उसके बेटे की मौत का जश्न मनाया जा रहा है। जब वो पैदा हुआ होगा तो कितने चाव से उसका नाम रखा गया होगा। जैसे, छोटे बच्चों को देखते ही उन पर प्यार आ जाता है वैसा ही उसे देखकर भी लोगों को आ जाता होगा…। …मैं सोचता रहा कि कितनी उमर तक मेरा और उसका जीवन एक तरह का प्रेम पाने वाला बना रहा होगा। उसकी मृत्यु पर खुश होने वाले कितने कितने दिख रहे हैं और उसे यहाँ तक लाने वाला एक भी शर्मसार चेहरा नहीं दिख रहा है…इस दुनिया का एक जीवित नागरिक होने के नाते मैं शर्मसार होता हूँ। और इस शर्म को समझने की कोशिश में कुछ लिखना हुआ। जो एक अलग अनुभव था। या कराची के चौसे कहानी का वह अनुभव जो मुझे आज भी रोमांचित करता है। फल वाले की दूकान पर कराची के चौसे आम देखने का अनुभव जो बाद में लिखने में जाकर पूरा हुआ। कि पाकिस्तान से एक मीठा आम भी आता है। और मैं इसे दर्ज करना चाहता हूँ। लिखकर। जैसे मेरे पास लिखने को एक यही वसीयत है। अपने इंसान होने की वसीयत।

आप बच्चों के लिए लिखते हैं और साथ ही साथ बाल साहित्य क्षेत्र को समृद्ध बनाने के लिए भी विभिन्न तरीकों से काम करते हैं। आपके अनुसार बाल साहित्य के क्षेत्र सबसे ज्यादा किस चीज़ की ज़रुरत है? इस क्षेत्र की क्या चुनौतियाँ हैं और आप उन्हें अपने काम और लेखन के माध्यम से इसे कैसे संबोधित करते हैं?

नदी की तरह बाल साहित्य का एक कैचमेंट एरिया होता है। अलग-अलग इलाकों में एक साथ काम करने से उसकी एक धारा बनती है। सबसे पहले इस इलाके में युवा रचनाकारों का आना ज़रूरी है। उन्हें प्रेरित करना। उनकी प्रयोगशीलता को मंच देना। (उनसे इस इलाके में ताज़गी आएगी।) बाल साहित्य के विभिन्न मसलों पर विमर्श को जगह-जगह ले जाना। मसलन, बच्चों और बचपन की अवधारणा की हमारी समझ ही इतनी दोषपूर्ण है। पढ़ने का आनंद को बहुत कम करके समझा-देखा जाता है। बच्चों के लिए एक कृत्रिम जीवन बाल साहित्य में रचा जाता है। उन्हें जीवन का साझेदार नहीं माना जाता है। इसलिए बाल साहित्य बहुत सीमित विषयों से अपना काम चलाता रहता है।

मैंने पिछले बीस साल से पत्रिकाएँ निकालीं। चकमक, साइकिल, प्लूटो… पत्रिका निकालना एक तरीका है जिसमें नियमित रूप से इस पूरे इलाके में एक साथ काम होता रहता है। आपको नियमित रूप से ताज़ी सामग्री चाहिए। अनुवादक चाहिए। चित्रकार चाहिए। पाठक चाहिए। बल्कि कहिए ग्राहक-पाठक चाहिए। पत्रिकाएँ बेचने वाले चाहिए। उन्हें प्रमोट करने वाले माता-पिता-लाइब्रेरियन, शिक्षक चाहिए। पत्रिकाएँ अपने लेखकों-चित्रकारों से तथा अन्य लोगों से नियमित सम्वाद का मौका बनाती हैं।

पत्रिकाओं में हमने कोशिश की कि पारम्परिक कहानियों और कविताओं तथा इतर साहित्य के अलावा समसामयिक मसलों पर भी लेखन हो। मसलन, कुछ सामग्री ऐसी हो कि पता चले कि यह पत्रिका 2019 में भारत नाम के देश में निकल रही है। बच्चों से जीवन साझा करने में लेखकों तथा बड़ों को बहुत हिचक होती है। वे छत्तीसगढ़ को बस छत्तीसगढ़ की लोककथाओं जितना ही बताना चाहते हैं। उसमें सहूलियत भी है। कोई सवाल नहीं है। तो मसला यह है कि जीवन और साहित्य अलग हो सकते हैं? हमें लगता है कि नहीं हो सकते हैं।

जीवन साझा करने की हिचक का परिणाम एक यह भी है कि ज़्यादातर कहानियाँ-कविताएँ जीवों, जानवरों पर आधारित हैं मगर उनमें से एक फीसदी भी उन जीवों की आदतों और उनके व्यवहार, उनकी मुश्किलों को पेश नहीं करती हैं। वे इंसानी मूल्य तथा जीवन को ही पेश करती हैं। इंसानी जीवन को इंसानों और समाज से दूर जीवों के माध्यम से पेश करना फिर भी एक सहूलियत पैदा करता है। क्योंकि वहाँ पलायन कर जाने का एक रास्ता हमेशा मौजूद है।

भाषा भी एक मसला है। कि भाषा का दिशा लिखित भाषा की तरफ होना चाहिए कि बोलचाल की भाषा की तरफ। एक मानक हिन्दी या अलग-अलग रंगतों वाली एक मिलीजुली हिन्दी। इस मामले में भी रचनाकारों से संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। हाशिए के जीवनों (इंसानों और जीवों और नदियों सबके) पर लिखने के लिए नई भाषा चाहिए। जो खुली हो। जिसमें इन जीवनों को देख पाने की लोच हो। जो इन जीवनों को सहेजे सहेजे पाठक तक पहुँच सके।

फिर मसले बड़ों और बच्चों की दृष्टि के हैं। यह मुहावरा बहुत प्रचलित है कि बच्चों के नज़रिए से लिखा है। या बच्चा बनकर लिखा है। या वे बच्चा बनकर लिखते हैं। लिखते हैं बड़े ही। तो यह सम्वाद करना कि आप बड़े हैं तो बड़े बनकर ही लिखिए। बच्चा बनकर वैसे भी नहीं लिख पाएँगे…और पूरी जिम्मेदारी लेते हुए लिखिए। भाषा को उसके छरहरेपन के साथ लिखिए। चीज़ों का सरलीकरण करके नहीं।

इन सब मसलों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि रचनात्मक लेखन है तो उसमें कुछ रचना हो रही है कि नहीं। और जिस विधा में लिख रहे हैं वह विधा बच पाई या विचारों का बोझ तले दब गई।

ऐसे तमाम मसलों के लिए हमने कुछ पहलें कीं। एक तो लेखन के लिए तीन सृजनपीठ शुरू कीं। इससे बड़े लेखकों को सालभर बाल साहित्य लेखन तथा विमर्श के लिए आमंत्रित किया गया। उनके साथ मिलकर युवाओं से सम्वाद बनाया। क्योंकि इस इलाके में युवाओं की भागीदारी बहुत ज़रूरी है। नियमित रूप से लेखन कार्यशालाएँ कीं। साल में एक बार विभिन्न यूनीवर्सिटीज़ के युवाओं को बाल साहित्य इंटर्नशिप के लिए आमंत्रित किया।

भारतीय भाषाओं के साथ सामग्री के लेन-देन के लिए अलग-अलग भाषाओं के लेखकों के साथ कार्यशालाओं की योजना बनाई। इससे विभिन्न भाषाओं के लेखकों का आपसी सम्वाद होगा। और यह विविधता हमारी ताकत बनेगी। बड़ों के लिए लिखी गई बेहतरीन किताबों से बच्चों के लिए उपयुक्त अंशों को खोजा। कविताओं को खोजा। इससे कई विषयों के बेहतरीन लेखन के नमूने हम अन्य लेखकों के सामने ला सके। ताकि ठोस रूप से कहा जा सके कि फलाँ विषय पर भी बच्चों के लिए लिखा जा सकता है। लेखकों तथा चित्रकारों अनुवादकों को हतरीन मानदेय की व्यवस्था की। और एक मॉडल बनाने की कोशिश की कि इस काम से जीवन चलाया जा सकता है। रियाज़ के तहत खासतौर पर प्रकाशकों से बेहतर मानदेय के लिए सम्वाद किया। चित्रकारों के लिए रियाज़ अकादमी जैसे प्रयासों को आगे बढ़ाया। और इस वर्ष से चित्रकारों के लिए भी सृजनपीठ शुरू की। चित्रकारों के साथ नियमित सम्वाद हुआ। उनके चित्रों के किरदार उनके जीवन के किरदारों से जुदा कैसे रहे आते हैं। वे साइकिल बनाते हैं तो क्यों नहीं सोचते कि वह किसकी साइकिल है। जो पेड़ खड़ा है वह कहाँ खड़ा है? एक माली ने मुझे बताया था कि पेड़ का एक सामना होता है और एक पीठ होती है। चित्रकार ने मुझे कभी यह नहीं बताया। चित्रकार को माली की तरह पेड़ देखना आना चाहिए।
किसी भी रचना में बात इंसान के परिप्रेक्ष्य. से ही क्यों देखी जाती है? उदाहरण के लिए अगर कोई कविता है – जिसके पास चली गई मेरी ज़मीन, उसकी के पास अब मेरी बारिशें भी चली गईं..तो चित्रकार क्यों नहीं एक साँप के या एक केंचुए या एक मेंढ़क या एक टिटहरी की नज़र से इसे देखता है। बच्चों की ऊँचाई दो-ढ़ाई से लेकर साढ़े तीन चार फुट तक के परिप्रेक्ष्य से चीज़ें वैसी नहीं दिखेंगी जैसी कि एक बड़े की ऊँचाई से दिखेंगी। एक बच्चे के लिए एक किलोमीटर की दूरी और एक बड़े के लिए एक किलोमीटर की दूरी दो बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं। ज़्यादातर चित्रकार इन सब मसलों पर बहुत ठहरते नहीं हैं। कम चित्रकार हैं जो लीनियर पर्सपेक्टिव को अपनी तरह से इस्तेमाल कर पाते हैं।

कार्यशालाओं तथा अन्य संगठनों के माध्यम से बाल साहित्य के मसलों पर विमर्श के लिए सक्रिय भागीदारी। और लगभग साढ़े तीन सौ लेखकों तथा लगभग सौ से ज़्यादा इलस्ट्रेटर्स का एक समूह बनाया जिससे नियमित सम्वाद कायम किया। इसमें साहित्य के साथ-साथ थिएटर या इतिहास आदि विभिन्न विषयों पर लिखने वालों को जोड़ा। इससे बाल साहित्य में विविध विषयों पर लेखन का एक रास्ता खुला। हिन्दी के लगभग सभी बड़े लेखकों को बाल साहित्य लेखन के लिए नियमित आग्रह किया। उन्हें लिखने के लिए मनाया। और आज लगभग बीस से ज़्यादा किताबें बड़े लेखकों की प्रकाशित हुईं या होने जा रही हैं। ऐसी सामग्री प्रकाशित करने की योजना बनाई जो भाषा, कहन, विषय आदि के मामले में नई ज़मीन तैयार करती हो।

पत्रिकाओं तथा बाल साहित्य की पहुँच के लिए पुस्तक चयन समिति आदि मंचों पर अच्छे बाल साहित्य की पैरवी की। बेहतरीन बाल साहित्य के लिए पाठ्यपुस्तकें एक अहम कड़ी होती हैं। इसलिए एनसीईआरटी, एससीईआरटी (राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल आदि) की हिन्दी साहित्य की किताबों के लिए बेहतर सामग्री तथा चित्र उपलब्ध कराए। उन्हें डिज़ाइन किया। लगभग तीस उम्दा किताबों का अँग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया। लगभग बीस से ज़्यादा किताबें सम्पादित कीं। इसमें अन्वेषी सीरिज़ की एकलव्य द्वारा हिन्दी में प्रकाशित सात विलक्षण किताबें शामिल हैं। ये किताबें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि हिन्दी में विषय के तौर पर ये पहली पहली किताबें हैं। सिर का सालन तो बाल साहित्य की समझ का विस्तार करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रही है।

अलग-अलग संस्थाओं के बाल साहित्य के इलाके में हो रहे विभिन्न प्रयासों के साथ साझा किया। मसलन, एनसीईआरटी की फिरकी तथा प्राथमिक शिक्षा विभाग के साथ काम किया। कोंकणी भाषा मंडल के साथ कोंकणी बाल साहित्य में काम किया। इसके अलावा सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर उनके एजेण्डे में बाल साहित्य के कार्यक्रम जुड़वाए। भारत भवन, जनजातीय संग्रहालय आदि मंचों पर नियमित बाल साहित्य के कार्यक्रम किए।

आपके अनुसार, बच्चों के साहित्य को बढ़ावा देने में पुरस्कार क्या भूमिका निभाता है?

अवार्ड एक मौका पैदा करते हैं। विमर्श का। सोचने-समझने का। और किसी काम को सेलीब्रेट करने का। अवार्डी के सारे काम को सामने लाने का। बाल साहित्य के काम से एक लिजलिजी पवित्रता चिपकी है। लोग इस काम की तारीफ वैसे ही करने के आदी हैं जैसे वे अस्पताल में शनिवार को फल बाँटने की करते हैं। अच्छी साख वाले अवार्ड इसे एक गम्भीर और बुनियादी काम की पहचान देते हैं। लेखक की और उसके काम की पहचान में आपसी विस्तार करते हैं। और इसका फायदा दोनों को और कुल मिलाकर उस काम को होता है। सीमित ही सही पर एक उपमा इस पर विचार करते हुए मन में आई।

सिनेमा देखने जाते हैं तो गेटकीपर आधी टिकिट फाड़कर अपने पास रख लेता है। और सिर्फ आधी टिकिट से हम फिल्म देखते हैं। सिर्फ वही आधी टिकिट लेकर भीतर नहीं जा सकते हैं। भीतर जाने वाली आधी टिकिट तो रचना ही है। लेखक की रचना। पर अवार्ड उसमें एक आधी टिकिट और लगाता है। जो गेटकीपर को यकीन दिलाती है। लेखक के पास अपनी रचना ही रहती हैपर एक निशान आ जाता है अवार्ड का। कि यह अवार्ड उससे जुड़ा है।

पश्चिम और भारत के क्षेत्रीय बाल साहित्य की तुलना करते हुए कोई टिपण्णी करना चाहेंगे l अपने देश के क्षेत्रीय भाषाओँ के बाल साहित्य में सचित्र बाल साहित्य की क्या स्थिति है?

मैं यह जो कुछ कहूंगा वह सीमित (- कोई दो ढाई सौ किताबें उळटने-पुलटने के आधार पर – ) अनुभव के आधार पर कहूँगा। पश्चिम में सूर्य उग चुका है। पूर्व में अभी भोर है। भोर में चीज़ें साफ साफ नज़र नहीं आती हैं। हाथी की पीठ है कि पहाड़ पता नहीं चलता। पर अब खासतौर से हिन्दी में (हिन्दी में आज सम्भवतया देश का सबसे अच्छा बाल साहित्य प्रकाशित हो रहा है।) कुछ उम्मीद जगाने वाले काम हो रहे हैं। पर साथ ही पश्चिम के बाल साहित्य में काफी हिस्सा ऐसा लगता है कि उन्हें अब ज़्यादा दिखने लगा है। वहाँ की किताबों की भाषा में, साहित्य में तथा चित्रों में बहुत आत्मविश्वास दिखता है। बेझिझकपन है। कई विषयों को कहने के लिए हम अभी भाषा ही तलाश कर रहे हैं वहाँ उन पर सम्वाद आम हो गया है। पर वहाँ भी ऐसी किताबें कम हैं जो साहित्यिक तत्वों से लैस हैं। और जो एकाधिक बार पढ़ी जाने को पाठक को मजबूर कर दें। और अनुभव बन जाएँ। एक बार चमत्कार पैदा करने वाली किताबें अपेक्षाकृत ज़्यादा हैं।

चित्रों में विवरणों पर अत्यधिक जोर है। कल्पना के लिए कम स्थान है। रियलिटी पैदा कर देने का भाव बहुत है। रियलिटी का मैजिक पैदा कर देना कुछ कम है। पर रंगों को बहुत एक्सप्लोर किया है। हमारे चित्रों में बुनियादी रंगों के आसपास के ही कुछ शेड्स आमतौर पर दिखेंगे पर पश्चिम की किताबों में एक ही रंग के सुदूर के शेड्स देखे जा सकते हैं।

रंग के अलावा दूसरे माध्यमों के प्रयोग काफी हैं। अपने पेंटर्स तथा बड़े लेखकों से परिचय कराने वाले साहित्य का बाहुल्य है जो पाठकों को साहित्य तथा कला की तरफ ले जाने में शायद सहायक होता होगा। हमारे यहाँ अभी अभी कुछेक पेंटर्स पर केन्द्रित किताबें आई हैं। वे भी उनकी जीवनी ज़्यादा हैं उनके चित्रों को समझने की तरफ ले जाने की कुव्वत उनमें नहीं है। वे इस माध्यम में चित्रकार के योगदान को रेखांकित कर पाने में असमर्थ हैं। यह बात नहीं है कि हम बच्चों को उनकी रेखाओं की क्वालिटी के बारे में बताएँ या उनके रंगों के अनुभव के बारे में बताएँ। अलग नहीं। वे बनी ही इस तरह हों कि उनमें रेखाओं का वैसा देख पाकर या रंग का वह अनुभव लेकर ही पाठक लौटे।

हमारे देश में समय आए जब बाल साहित्य पर शानदार काम हुआ। चाहे बांग्ला का उपेन्द्र किशोर से शुरू होकर सुनील गंगोपाध्याय के रहने तक चलने वाला अध्याय हो या मराठी में जी ए कुलकर्णी, विन्दा करन्दीकर जैसे उस्तादों (इस कड़ी में बाद में माधुरी पुरन्दरे तथा समकालीन बाल कविता में दासु वैद्य आदि) हों या मलयालम या तमिल के कुछ पुराने काम हों। हिन्दी में सर्वेश्वर जी के समय का पराग का काम याद कर सकते हैं। नवीनसागर, सफदर, सर्वेश्वर… इन सब कामों को देखें तो हमें आज इस इलाके में काफी आगे बढ़ जाना चाहिए था। शानदार रूसी किताबें भी जाने क्यों हमें इस इलाके में अपनी भाषाओं में काम करने के लिए बहुत प्रेरित नहीं कर सकीं। एक बेहतरीन रास्ता लोक साहित्य की तरफ जाता है। पर उसकी एक सुदृढ़ सुनने-सुनाने की परम्परा को हमने अपने हाथों से फिसल जाने दिया।

भारतीय भाषाओं में बच्चों के पढ़ने और चित्र पुस्तकों की स्थिति क्या है?

बाल साहित्य का अपना खुला बाज़ार अभी बनना है। एक बड़ा हिस्सा अभी भी स्कूलों से संचालित, नियंत्रित है। चित्रकथाएँ इस स्कूली बाज़ार से भी पोषित हैं। चित्रकथाओं ने किसी भी भाषा में पाठक तैयार करने और उन्हें पढ़ने की तरफ आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाई है। पर चित्रकथाओं की विधा पर हमारी हुनरमंदी कम है। ज़्यादातर किताबों में चित्रकथा और एक आम चित्रों वाली किताब के चित्रों को अलगाया नहीं जा सकता है। चित्रकथा में चित्र कथा का बंदी नहीं है। विजुअल लैंग्वेज पर हमारे यहाँ कम काम हुआ है। हम शब्दों से आक्रांत लोग हैं। सिनेमा में भी हमें डॉयलॉग ही चाहिए।

चित्रकथा का मतलब असल में कथा होनी चाहिए जो चित्रों के माध्यम से नहीं कही जा रही है। चित्र माध्यम नहीं हैं। वह चित्रों से ही कही जा सकती थी इसलिए कही जा रही है। चित्रों का विकल्प नहीं था। यह नहीं था कि शब्दों में कही जा सकती थी। मसलन, वहाँ दो हाथी नहीं थे। इसे चित्रों में नहीं कहा जा सकता है। चित्रकार एक हाथी का चित्र बनाएगा तो शब्द होंगे कि – वहाँ एक हाथी था। – ऐसे ही चित्रों की अपनी जगह होती है। वहाँ सिर्फ उनकी चलती है। हमारे पास ऐसे चित्र और चित्रों की कथाएँ कम हैं। पर हाँ, उनका स्थान बहुत ऊंचा है। वे पाठकों को बहुत आकर्षित करती हैं। वे एक तरह से भाषा का जंजाल तोड़कर आती हैं। शुरुआती दौर में जब स्कूल लिपि के इर्द गिर्द भाषा को महत्व देता है। और बोलने, सुनने और समझने की भाषा का संसार लिए बच्चे भाषा से जूझते हैं तब चित्रकथाएँ इस आतंक को परे रखकर सामने आती हैं। उनके चित्र बच्चे के भाषाई संसार को महत्व देती हैं। और शब्दों को डिकोड करने में मदद करती हैं। चित्रों को समझने से पैदा हुआ आत्मविश्वास भाषा सीखने में काम में आता रहता है। साहित्य जो एक झूठ रचता है उसकी गवाही देते हैं चित्र। और इस खेल में बच्चों को बहुत मज़ा आता है। एक बुढ़िया आसमान में एक चाँद टाँग रही थी। चित्र इस वाक्य को मान लेने लायक बनाते हैं। इसे करके दिखाते हैं। उस बुढ़िया से पहचान कराते हैं। शब्द और चित्र मिलकर उन्हें अर्थ तक पहुँचने में मदद करते हैं। भारतीय भाषाओं में आज हिन्दी चित्रकथाओं के मामले में भी सम्भवतया सबसे समृद्ध है। इसमें अनुवाद का काम शामिल है।

क्या हम बाहर के देशों के बाल साहित्य और भारतीय बाल साहित्य के बीच समानताएँ बना सकते हैं?

  1. सबसे अच्छा बाल साहित्य वह है जो इकहरा न हो। जिसमें अर्थों की कई तहें हों। यह सायास नहीं बनाई जातीं। वे तब आती हैं जब रचनाकार पूरी स्वतंत्रता के साथ लिखता है। और दूसरी आवाज़ों, आहटों को लिखने में आने देता है। विचार के स्तर पर सरलीकृत नहीं करता। इसलिए ऐसा साहित्य बड़ों और बच्चों दोनों को ही खींचेगा। और पाठक बार-बार उस किताब तक आएगा। हर बार अर्थ की नई रंगतों के लिए। भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य एवं पश्चिम का बाल साहित्य दोनों के ही खज़ाने में ऐसी किताबें कम हैं।
  2. पाठक की एक टैरिटरी होती है। रचनाकार को रचना में इसे सुरक्षित बचाना होता है। यहीं पाठक उसमें प्रवेश करता है और शामिल होता है। इन्ही जगहों में वह अर्थों की अपनी छटाएँ बिखेरता है। और इस बात का आनंद हासिल करता है। पश्चिम तथा पूर्व दोनों के ही बाल साहित्य में यह स्पेस बहुत कम है। रचना अधिक से अधिक बताने की फिराक में रहती है। चित्र तो शब्दों से एक कदम आगे रहते हैं। बच्चे से कुछ समझने से न छूट जाए इस बात की चिंता नकारात्मक प्रभाव डालती है।
  3. लोक कथाएँ चाहे वे पश्चिम की हों या पूर्व की। वे ज़्यादा उदार होती हैं। लोककथाएँ अपने पाठकों पर ज़्यादा यकीन करती लगती हैं। बस किसी ने उन्हें राजनीतिक रूप से निर्मल न कर दिया हो।
  4. एक हद तक दोनों ही बाल साहित्य शिक्षा तथा पाठ्यपुस्तकों के बच गए काम पूरे करने में किसी न किसी तरह लगे रहते हैं। उनकी स्वतंत्र पहचान बनना बाकी है। खासतौर पर हमारे देश में।
  5. ईरान जैसे देशों ने बाल साहित्य एवं बाल फिल्मों दोनों में ही कुछ शानदार काम किए हैं। वे ऊपर के सब बिन्दुओं से मुक्त रहे आए। ईरान में अर्ली रीडर्स की किताबों में रियलिस्टिक चित्रों के साथ साथ आप को अमूर्त चित्र भी दिख जाएँगे। वहाँ के पेंटर अपने बच्चों के लिए चित्र बनाते हैं। मृत्यु जैसे विषय पर अर्ली रीडर्स के लिए बनी उनकी एक किताब और उसकी बिल्ली आज भी मेरी आँखों के सामने घूम जाती है। और उसके ऑफ व्हाइट रंग मन में एक ऊष्मा पैदा करते हैं।