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इस कोर्स में सीखना-सिखाना इतनी सहजता से होता है कि जैसे वो जीवन में हो रहा हो। हँसते-बोलते, उठते-बैठते, गाते, मिलते-बैठते। किताबों से निकल-निकलकर कहानियाँ-कविताएँ…आती चली जाती हैं। चार कुर्सियों पर खाना खाते हुए किताबों के कई-कई किरदार आते रहते हैं। बातों में खोकर आप एक रोटी ज़्यादा खा लेंगे। यकीन कीजिए कि किताबें इसी एक रोटी से जिंदा रहती हैं। इतने दिलकश माहौल में आप किताबों के प्रेम में न पड़ेंगे तो और क्या करेंगे। काश! ये महक हमारे सभी स्कूलों, किताब घरों, पुस्तकालयों तक पहुँचे…शुक्रिया ट्र्स्ट! एक साझा सपना देखने के लिए…उसे जीने के लिए…।

सुशील शुक्ल, हिंदी लेखक एवं संपादक